Tuesday, January 19, 2016

इस  शहर मे

सपने रस्तो पे अपनी राह ढूँडदते मिले
उनसे पूछा की मज़िल कहा मिलेगी
हस कर एक ने कहा सपनो की कोई मज़िल नही होती
कई गुमनाम ख्वाब हैं इस  शहर मे


कुछ आगे चला तो किस्मत निराश सी मिली
मैने पूछा की किस्मत  क्यूँ उदास हे
मुस्कुरा कर कहा उसने की किस्मत की कोई कीमत नही होती
किलो के भाव बिकती है किस्मत इस  शहर मे

आगे एक हुजूम सा आ रहा था  , हज़ारी की भीड़
मैने भीड़ से पूछा की पहचान कहा है तेरी
उसने कहाँ सपने और किस्मत खरिदनो को पहचान मैं बेच आई
गुमनाम कई जी रहे हैं एस इस  शहर मे

हताश हो कर मे फुटपाथ पर ही बैठ गया
ना पहचान ना किस्मत ना सपने थे मेरे पास
सोचा मेने हार नही माहुँगा ,मेहनत से किस्मत हौसेल से सपने वापस ले अवँगा
एक नयी पहचान बनाउगा इस  शहर मे 

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